Wednesday, October 9, 2013

गुणग्राहकता

युग बदलने से भी परिस्थितियां नहीं बदलतीं। तभी तो द्रोणाचार्य के मना करने के बावजूद मिट्टी का द्रोणाचार्य बनाकर एकलव्य अपने ज्ञान का संधान करते-करते नामी धनुर्धर बन जाता है। कर्ण अपनी पहचान छुपाकर परशुराम का प्रिय पात्र बन उनसे सारे शस्त्रास्त्रों का संचालन सीख लेता है। इतिहास न जाने ऐसे कितने उदाहरणों से भरा पड़ा है, जब शिष्य ने अपनी गुणग्राहकता के बल पर अपना अभीष्‍ट हासिल कर लिया और बड़े से बड़े गुरु चाहकर भी अपने प्रिय को सर्वोत्कृष्ट ज्ञान नहीं दे पाए।

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पढ़ाई लिखाई के हिसाब से कला स्नातक और पेशे से शिक्षा मित्र हूँ।

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