Wednesday, October 9, 2013

निरर्थक शिक्षा

कहते हैं कि बुनियाद ही कमज़ोर हो तो फ़िर ईमारत की मजबूती हमेशा संदेह में रहती है । देश में आज सबसे बुरी हालत प्राथमिक शिक्षा की है और शिक्षकों की भी । न तो विद्यालयों के पास समुचित भवन हैं , न ही पेय जल , पुस्तकालय , पाठय सामग्री आदि बुनियादी सुविधाएं । ऊपर से शिक्षकों को पढाने के अतिरिक्त एक जिम्मेदारी सरकार ने और सौंप दी है और वो है मध्याह्न भोजन की । शहरों में तो खैर जैसे तैसे भोजन बनाने वाले भी मुहैय्या करा दिए गए हैं किंतु गांवों के स्कूलों में जहां पहले से ही शिक्षकों की भारी कमी है वहां उनमें से भी कुछ तो दोपहर भोजन योजना में ही लगे रहते हैं । किंतु ऐसा नहीं है कि सारा दोष सिर्फ़ सरकार और प्रशासन का ही है , शिक्षा आज एक व्यवसाय का रूप ले चुकी है और स्कूल कालेज मुनाफ़ा कमाने वाले कारोबार बन गए हैं । स्कूलों में किताबों से लेकर वर्दी तक जबरन बेचे जा रहे हैं । हर तरह एक भागमभाग सी मची हुई है । ऐसे में कोई आदर्श शिक्षा और शिक्षक की कल्पना भी कैसे कर सकता है ।

इन्हीं सबका परिणाम ये हुआ है कि आज न तो छात्रों के लिए कोई शिक्षक उनका आर्दश , उनका मार्गदर्शक गुरू और जीवनभर की प्रेरणा बन पाता है और न ही बनने को उत्सुक भी है । एक निर्धारित घिसे पिटे पैटर्न पर चल रही शिक्षा प्रणाली को उम्र भर खुद ढोता और छात्रों की पीठ पर लादता हुआ एक शिक्षक अब इस आस में कभी नहीं रहता कि उसका कोई छात्र कल होकर जब देश और समाज के निर्माण में कोई बडी सकारात्कम भूमिका निभाएगा तो खुद उस शिक्षक का दिया हुआ ज्ञान ही उसके मूल में होगा । शिक्षा और शिक्षकों को यदि अपनी गरिमा बनाए बचाए रखनी है तो उन्हें इस समाज में रहकर भी इनकी तमाम कुरीतियों और दुर्गुणों से खुद को बचाए रखकर शिक्षा के ध्येय के लिए साधना रत होना होगा ।

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पढ़ाई लिखाई के हिसाब से कला स्नातक और पेशे से शिक्षा मित्र हूँ।

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